धूप-छाँव
शाम तले बूंदों के झुरमुट में
तेरे ख्यालों के जुगुनू सजते हैं
मद्धिम-मद्धिम रोशनी में
तेरा हर अहसास ताश के पत्तों की तरह
खुलते है
कुछ शब्दों में सराबोर हैं
कुछ अनकहे अल्फाज़ हैं
शाम के गहराते अँधेरे में
जुगुनू की चमक और चमकती हैं
तब तेरे अक्स को खुद की आँखों में
मुक्कमल होता पाते हैं
उस अक्स में समाई मेरी
परछाई हैं
जो धूप-छाँव की तरह लेती
अंगड़ाई हैं ………
Labels: कविता

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