Wednesday, September 9, 2015

मन

मन 


मन पर जोर चले ना काहे का 
मनमीत होवे हैं अपने मन का 
करे वही जो कहना हो दिल का 
परवाह न करे ये किसी बंधन का 

मन होता हैं चंचल 
जो दिलो में मचाता हैं हलचल 
हर वक़त करे नये इच्छाओं की तलाश 
कभी न करे किसी को हताश 

 सपनो में रहना, कल्पनाओ में बहना 
हैं इसका काम 
आकाश से बातें करना 
समुंद्र की सैर करना 
है इसकी पहचान 

पल में अपना , पल में पराया बन जाये 
कब कोई मन  में बसे या मन  से दूर हो जाये 
खबर न किसी को इसकी लग पाए 
ये तो  सभी को अपनी ऊँगली पर नचाये 

सभी को फ़साये  मन अपने मोहजाल में 
पहचान न करे अच्छे बुरे का किसी भी हाल  में
गुम हो जाये ये भेडचाल में 
भारी  पड़े सब पे ये हर काल  में 

मन का  क्या 
यह तो है एक मिटटी का घड़ा 
जिसे जैसा चाहो वैसा ढल जाये 
सभी को अपने गुणों से आकर्षित किये जाये
 
जैसे रखता सारथि घोड़े के लगान  को 
अपने वश में 
वैसे रखो मन को नियंत्रण में लेकिन 
यह न होता सम्भव 
हर कार्य कर दें असम्भव 

राम जाने इसकी कथा 
इसमें छुपी हैं ना जाने 
कितनी ही व्यथा 
चेहरा हैं मन का आइना 
अब इससे जायदा क्या हैं कहना ?

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