वज़ूद
वज़ूद
इस माहौल में घुटन हैं
जिल्लत हैं
फिर भी
मैं न जाने क्यों रोज-रोज
इस माहौल से खुद को
मुखाबित करती हूँ ।
हर दिन इस माहौल
को बर्दाश करने को
खुद को तैयार करती हूँ ।
ये माहौल हमसे हमारी पहचान छीनता
खुद से खुद का वज़ूद दूर करता
बस
स्वार्थ,स्वार्थ, और स्वार्थ,
ये माहौल मुझे दिखता
वज़ूद हैं ।
इस माहौल में रहना मेरी मज़बूरी हैं ।
यहाँ हर ढलते सूरज की कहानी अधूरी हैं ।

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