Thursday, March 31, 2016

रात

 रात

रात के अँधेरे में सोच
और गहरी हो जाती है
खुद से खुद की पहचान
तब और नजदीक से होती है
क्या है हम अब  
क्या हो जाते है ?
उजले दिनों में
ये बात निखर आती है

ये रात तन्हा तो होती है
पर
अपनी होती है
अँधेरे और उजाले 
हकीकत और परछाई है 
जिसमे जीवन की पूरी गहराई समाई है


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