रात
रात
रात के अँधेरे में सोच
और गहरी हो जाती है
खुद से खुद की पहचान
तब और नजदीक से होती है
क्या है हम अब
क्या हो जाते है ?
उजले दिनों में
ये बात निखर आती है
ये रात तन्हा तो होती है
पर
अपनी होती है
अँधेरे और उजाले
हकीकत और परछाई है
जिसमे जीवन की पूरी गहराई समाई है

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