Thursday, August 17, 2017

कविता लिखनी की भी एक शर्त होती है

 कविता लिखनी की भी एक शर्त होती है

कविता लिखनी की भी एक शर्त होती है
यह शर्त भी कई बार बेअसर होती है
हाथ कलम तो पकड़ना चाहती है
पर कलम शब्द फूटने से परहेज़ करती है
ढलती शाम का सूरज और उगती शहर की लालिमा
मन को शीतलता के काफी करीब तक ले जाती है
जहन में बुनते हुए उथल पुथल ठहराव को तलाशती है
तब मन कविता के भाव को उकेरती है और शब्दों में पिरोती है
कभी अपनी सी कभी पराई सी प्रतीत होती है
जब भी उमड़ती है तो बेपनाह उमड़ती है
जहां चाह वहां राह फिर तो चक्कर घिरनी सी घूमती है
रह रह कर हाल ए दिलदर्द ए जुबां बयान करती है
यह तो अठखेलियों सी अल्हड़पन करती है
यह तो तितली बन हर जुबां का हाल जान लेती है
लेकिन अक्षरों में सिर्फ सिमटने में वक़्त लगाती है


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