Wednesday, December 13, 2017

अक्स

अक्स 

ढलती शाम का अक्स मुझे खूब भाता है
ना 
अंधेरी रात का पहरा होता है 
ना 
सुबह का उजाला गहराता है 
बस सब कुछ धुंधला धुंधला में छिपा रहता है
ये छिपना ही मुझे अपनी ओर खींचता है
इस छिपने में कोई भी अक्स साफ नहीं होता है
चाहे वो अक्स इंसान का हो या भविष्य का

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