अक्स
अक्स
ढलती शाम का अक्स मुझे खूब भाता है
ना
अंधेरी रात का पहरा होता है
ना
सुबह का उजाला गहराता है
बस सब कुछ धुंधला धुंधला में छिपा रहता है
ये छिपना ही मुझे अपनी ओर खींचता है
इस छिपने में कोई भी अक्स साफ नहीं होता है
चाहे वो अक्स इंसान का हो या भविष्य का

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