नयी उम्मीद
नयी उम्मीद
रोज घर से निकल भीड़
में गुम हो जाती हूँ
और
इस भीड़ में न जाने
कितने बेबस और लाचार
चेहरों से सामना होता हैं
वो चेहरे रोज नये तो होते हैं
पर
उन चेहरों की बेबसी एक सी होती हैं
आश्चर्य
तो तब होता हैं
जब बेबसी और लाचारी भरी जिन्दगी से भी
वो अपनी एक मुस्कराहट से
दुसरो को जिन्दगी जीने की
नयी उम्मीद दे जाते हैं

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