Wednesday, December 13, 2017

आज भी एक पिता

 आज भी एक पिता 
आज भी एक पिता के लिए उसकी बेटी
मजबूर होने का सबब बन रही है
सब कुछ में मीडियम होते हुए भी
समाज से नकारे जाने के सोच से सफर कर रही है
यह वही पिता है
जिसने बेटी पर ना कभी कोई पाबन्दी लगाई
ना ही बेटी की किसी इच्छा पर मनाही की मुहर लगाई
लेकिन आज जब बेटी बड़ी हो गई
उसके लिए वर की तलाश भी जारी हो गई तो
अब
पिता को रह रह कर यह अहसास सा हो रहा है कि
क्यों बेटी को शहरनुमा माहौल में उसने ढलने दिया
क्यों बेटी को समय के साथ चलने दिया
शायद
अगर बेटी समय से पीछे रहती
शहर को ना अपनाये होती
तो
समाज शायद उसे ना नकारता
शायद ही?
पिता इस सोच में खुद को घुलाये ही जा रहा है
पर एक पिता अपनी उम्मीद को कहां छोड़ता है?
बेटी का ब्याह ही उसकी संस्कृति में
उसे गंगा नहाने का पुण्य दिलाता है

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