आज भी एक पिता
आज भी एक पिता
आज भी एक पिता के लिए उसकी बेटी
मजबूर होने का सबब बन रही है
सब कुछ में मीडियम होते हुए भी
समाज से नकारे जाने के सोच से सफर कर रही है
मजबूर होने का सबब बन रही है
सब कुछ में मीडियम होते हुए भी
समाज से नकारे जाने के सोच से सफर कर रही है
यह वही पिता है
जिसने बेटी पर ना कभी कोई पाबन्दी लगाई
ना ही बेटी की किसी इच्छा पर मनाही की मुहर लगाई
जिसने बेटी पर ना कभी कोई पाबन्दी लगाई
ना ही बेटी की किसी इच्छा पर मनाही की मुहर लगाई
लेकिन आज जब बेटी बड़ी हो गई
उसके लिए वर की तलाश भी जारी हो गई तो
अब
पिता को रह रह कर यह अहसास सा हो रहा है कि
क्यों बेटी को शहरनुमा माहौल में उसने ढलने दिया
क्यों बेटी को समय के साथ चलने दिया
उसके लिए वर की तलाश भी जारी हो गई तो
अब
पिता को रह रह कर यह अहसास सा हो रहा है कि
क्यों बेटी को शहरनुमा माहौल में उसने ढलने दिया
क्यों बेटी को समय के साथ चलने दिया
शायद
अगर बेटी समय से पीछे रहती
शहर को ना अपनाये होती
तो
समाज शायद उसे ना नकारता
अगर बेटी समय से पीछे रहती
शहर को ना अपनाये होती
तो
समाज शायद उसे ना नकारता
शायद ही?
पिता इस सोच में खुद को घुलाये ही जा रहा है
पर एक पिता अपनी उम्मीद को कहां छोड़ता है?
बेटी का ब्याह ही उसकी संस्कृति में
उसे गंगा नहाने का पुण्य दिलाता है
पर एक पिता अपनी उम्मीद को कहां छोड़ता है?
बेटी का ब्याह ही उसकी संस्कृति में
उसे गंगा नहाने का पुण्य दिलाता है

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