मैं क्यों लिखती हूँ
मैं क्यों लिखती हूँ
मैं जो भी लिखती हूँ, नही जानती कि क्यों लिखती हूँ
यह खाली पन्ने
मुझसे देखे नहीं जाते
मैं इन पन्नों को भरने के लिए लिखती हूँ
मन के अंदर खाने में मची है हलचल मेरे
मैं इस हलचल को शांत करने के लिए लिखती हूँ
अपने आप से जंग ठाने बैठी हूँ मैं
मैं अपनी जीत टी करने के लिए लिखती हूँ
उड़ना चाहती हूँ मैं भी दूर गगन में
मैं पंखों की चाहत में लिखती हूँ
हैं रास्तों पर लाख कांटे बिछे हुए
मैं मंजिल पाने के लिए लिखती हूँ
कोरे कागज के सामान जिन्दगी है मेरी
मैं जिन्दगी को रंगीन बन्ने के लिए लिखती हूँ
है लाख शिकायत मुझे उस खुदा से
मैं उस खुदा को पाने के लिए लिखती हूँ
मैं लिखती हूँ, नहीं जानती की मैं क्यों लिखती हूँ .

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