खुद के पंख
खुद के पंख
मुझे स्त्री जन्म मिला
ये जन्म मैं भरपूर अपनी मर्जी से जिऊंगी
हर वो काम करूँगी जिसे करके मेरा आत्मविश्वास बढ़ेगा
खुद को किसी से कम नहीं आकूँगी
खुद के लिए अपनों से भी लड़ूंगी
खुद की सीमाएं, खुद की मर्यादा भी मैं ही मापूंगी
खुद के फैसले,खुद की इच्छाएं भी मैं ही तय करूँगी
लेकिन अब जब इन सभी फ़लसफों को जीने लगी हूँ
तो हर बार मुझे हालात हराने पर आतुर रहती
मैं भी कुछ पल हालात की बातों में आ कर
दो आंसू बहा लेती हूँ
फिर
फिर
अगली सुबह खुद से खुद को पाने की जद्दोजहद में लग जाती हूँ
खुद को हारते हुए नहीं, जीतते हुए स्वीकार करना चाहती हूँ
अपनी अस्मिता को खुद के मापदंडों पर ही खरा उतारना है
अपनी उड़ने की उडान में खुद के पंख को ही सबल बनाना है

0 Comments:
Post a Comment
Subscribe to Post Comments [Atom]
<< Home