Thursday, December 21, 2017

खुद के पंख

 खुद के पंख   

जब से होश संभाला तो हर पल यही सोच के खुश हुई कि 
मुझे स्त्री जन्म मिला
ये जन्म मैं भरपूर अपनी मर्जी से जिऊंगी
हर वो काम करूँगी जिसे करके मेरा आत्मविश्वास बढ़ेगा
खुद को किसी से कम नहीं आकूँगी
खुद के लिए अपनों से भी लड़ूंगी
खुद की सीमाएं, खुद की मर्यादा भी मैं ही मापूंगी
खुद के फैसले,खुद की इच्छाएं भी मैं ही तय करूँगी

लेकिन अब जब इन सभी फ़लसफों को जीने लगी हूँ 
तो हर बार मुझे हालात हराने पर आतुर रहती
मैं भी कुछ पल हालात की बातों में आ कर 
दो आंसू बहा लेती हूँ
फिर 
अगली सुबह खुद से खुद को पाने की जद्दोजहद में लग जाती हूँ 
खुद को हारते हुए नहीं, जीतते हुए स्वीकार करना चाहती हूँ 


अपनी अस्मिता को खुद के मापदंडों पर ही खरा उतारना है   
अपनी उड़ने की उडान में खुद के पंख को ही सबल बनाना है 

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