मुक्त
मुक्त
मैं क्यों बंधू उस रिश्ते में
जिसे रुपयों से टटोला जाता हैं
क्यों बंधू मैं उस रिश्ते में
जिसे सोने से तौला जाता हैं
कहने को हिस्सा हूँ मैं आधी आबादी का
फिर
क्यों हर बार मेरी बोली लगती हैं
रिश्ता ताउम्र का बनाना हैं
अफ़सोस
हर बार मंडी क्यों सजती हैं
मैं क्यों बंधू उस रिश्ते में
जिसे रुपयों से टटोला जाता हैं
वो कहते है ... रोते हैं .... चिल्लाते है ...
कभी – कभी डराते हैं, धमकाते हैं
मैं कहती हूँ
नही बंधना मुझे उन रिश्तों में
जहाँ जेब होतो ... जन्नत हो ...
नही बंधना मुझे उस रिश्ते में
बिना जेब जहाँ जहन्नुम हो ...
क्यों बंधू मैं उस रिश्ते में
जिसे सोने से तौला जाता हैं
क्यों झुकू किसी के जिद के आगे
मैं तो मुक्त रहना चाहती हूँ
क्यों रुकूं किसी के जिद के आगे
मैं उन्मुक्त उड़ना चाहती हूँ
मैं क्यों बंधू उस रिश्ते में
जिसे रुपयों से टटोला जाता हैं
मैं क्यों बंधू उस रिश्ते में
जिसे सोने से तौला जाता हैं

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