Friday, January 12, 2018

मुक्त

मुक्त

मैं क्यों बंधू उस रिश्ते में
जिसे रुपयों से टटोला जाता हैं
क्यों बंधू मैं उस रिश्ते में
जिसे सोने से तौला जाता हैं

कहने को हिस्सा हूँ मैं आधी आबादी का
फिर
क्यों हर बार मेरी बोली लगती हैं
रिश्ता ताउम्र का बनाना हैं
अफ़सोस
हर बार मंडी क्यों सजती हैं

मैं क्यों बंधू उस रिश्ते में
जिसे रुपयों से टटोला जाता हैं

वो कहते है ... रोते हैं .... चिल्लाते है ...
कभी – कभी डराते हैंधमकाते हैं

मैं कहती हूँ
नही बंधना मुझे उन रिश्तों  में
जहाँ जेब होतो ... जन्नत हो ...
नही बंधना मुझे उस रिश्ते में
बिना जेब जहाँ जहन्नुम हो ...

क्यों बंधू मैं उस रिश्ते में
जिसे सोने से तौला जाता हैं



क्यों झुकू किसी के जिद के आगे
मैं तो मुक्त रहना चाहती हूँ
क्यों रुकूं किसी के जिद के आगे
मैं उन्मुक्त उड़ना चाहती हूँ   


मैं क्यों बंधू उस रिश्ते में
जिसे रुपयों से टटोला जाता हैं
मैं क्यों बंधू उस रिश्ते में
जिसे सोने से तौला जाता हैं

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