बातो का सिलसिला
बातो का सिलसिला
बाते करना भी हैं एक कला
जो न जाने वह हैं एक बला
बाते करने का सिलसिला दो पहलु पर चलता
एक श्रोता दूसरा वक्ता कहलाता
बाते करे व्यक्तित्व की पहचान
रहे न कोई इससे अनजान
बातो में हो रोचकता तो सुनने को जी चाहे
यदि
बातो में हो नीरसता तो अनसुना किया जाये
बाते यदि दिल से कहीं जाये
तो फिर
क्यूँ न सबके मन को भाये
बातो में होती मन क सवाल जबाव
फिर क्यूँ
न करना चाहे सभी वाद विवाद
बातो से होता मन का बोझ हल्का
फिर क्यों
रहा जाये घुटकर सभी का
बातो से जिन्दगी का मिलता हैं रस
बिन
बातो के जिन्दगी हो जाती हैं नीरस
आनंद और ख़ुशी हैं बातो का राज
फिर क्यों
न बन सभी एक दुसरे के हमराज
बाते हैं मिश्री की गीली
फिर क्यों
न बोले सभी मीठी बोली

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