रिश्तों का नाप तौल
रिश्तों का नाप तौल
यह कैसा बाज़ारवाद है, जहाँ रिश्तों को भी पहले नापा और फिर तौला जाता हैं . रिश्ता कोई सा भी हो , पहले पहल फायदा देखा जाता है , उसके बाद रिश्तों के धागे को आगे बुना जाता हैं . कुछ नये तो कुछ पुराने रिश्ते हमारे इर्द गिर्द सदैव रहते है, हमे ही उनकी विशेषताओं के अनुरूप उनकी विशेषता का चयन करते हैं . यह आज की आधुनिकता रिश्तों कि नाप तौल है . जहाँ अपनापन खोखलापन भर है बस !
बिना नाप-तौल के, बिना विशेषताओं के, बिना शर्तो के भी कुछ रिश्ते है क्या ?
यह कैसा बाज़ारवाद है, जहाँ रिश्तों को भी पहले नापा और फिर तौला जाता हैं . रिश्ता कोई सा भी हो , पहले पहल फायदा देखा जाता है , उसके बाद रिश्तों के धागे को आगे बुना जाता हैं . कुछ नये तो कुछ पुराने रिश्ते हमारे इर्द गिर्द सदैव रहते है, हमे ही उनकी विशेषताओं के अनुरूप उनकी विशेषता का चयन करते हैं . यह आज की आधुनिकता रिश्तों कि नाप तौल है . जहाँ अपनापन खोखलापन भर है बस !
बिना नाप-तौल के, बिना विशेषताओं के, बिना शर्तो के भी कुछ रिश्ते है क्या ?
