नारी
नारी
सबसे कोमल मन पाया है
नारी रूप में जन्म लिया है
हर रिश्ते को सहेजती हूँ
हर पल प्रेम को समेटती हूँ
ना कोई शर्त ना कोई नियम
बस हर शक्स में खुद को
टटोलती हूँ
जब भी मन पसीजता है
दो आंसूं बहा लेती हूँ
जिस रात भी निराशा हाथ लगती है
अगली सुभ उम्मीद का दामन फिर पकड़ लेती हूँ
तभी मैं नारी कहलाती हूँ
