Friday, January 29, 2016

प्रेम की इबादत

 प्रेम की इबादत

तेरे प्रेम की इबादत को पूजते है
तेरा साथ पाकर अल्लाह का शुक्रिया अदा करते है

मुझे हर ख़ुशी नवाज़ने की तेरी जो शिद्दत है
उस पाक़ मन को नज़र ना लगे मेरी मिन्नत है

मेरे रूह में बसा तेरे प्रेम का हर अल्फाज़ है
नूर-ए-मोहब्बत तेरे हर स्पर्श का अहसास है

आँखों का नूर, ताज़-ए-सरताज़ से नवाज़ते हो मुझे
दिल-ए-तसब्बुर में बसा के रखते हो मुझे

या अल्ला ये नज़र-ए-इनायत मुझ पर बनाये रखना
मेरे यार की सलामत-ए-बख्श बनाये रखना

26 जनवरी आने से एक सप्ताह पहले से ही पूरी को दिल्ली को सुरक्षा प्रदान किया जाने लगा। हर एक आम को नागरिक को हर वक़्त सिपाहियों की निगरानी मिलने लगी। यह सब देख कर मन में खुद के सुरक्षित का भाव होने लगा। 
लेकिन यह सुरक्षा सिर्फ एक सप्ताह के लिए ही,26 जनवरी बीत जाने तक ही प्रदान की गई। जैसे ही 26 जनवरी बिता,सुरक्षा के सिपाही गायब ही हो गए। अब तो यह सिपाही दूर-दूर तक नज़र नहीं आते, दरकार पड़ने पर भी लापता रहते हैं।
काश , 26 जनवरी वाली सुरक्षा हम आम नागरिक को वर्ष के पुरे 365 दिन मिले तो हमारी दिल्ली घटनाओं, दुर्घटनाओं और वारदातों से मुक्त ही हो जायेगी। इस सुरक्षा में हर नागरिक दिल्ली में खुद को सुरक्षित महसूस करने लगता।

लगभग छह महीने से मैं अपने बस स्टॉप पर हर दिन एक आदमी को देखती हूँ और उसके कमाई के धंधे को भी। मैं जिस भी वक़्त बस स्टॉप पर पहुंचूं , वह आदमी मुझे जरूर दिखाई पड़ता है। वह आदमी हर बस में चढ़ता है और जो सवारी अपनी सीट ना छोड़ कर टिकट लेने के लिए नहीं उठता है, उन सभी से वह टिकट लाने के लिए पैसे ले लेता और बस में भीड़ बढ़ जाने पर वह सभी के पैसे ले कर बस से उतर जाता है। हर रोज़ वह यही करता है, यही उसके कमाई का जरिया है। मैं तो उसे पहचान चुकी हूँ तो बस में अपने सामने किसी भी सवारी को उसे पैसे नहीं देने देती हूँ। और ना ही मैंने कभी अनजाने में भी उससे टिकट मनवाई।

आज़ादी किसे नहीं पसन्द ?
खासकर लड़कियों को तो आज़ादी बहुत बहुत भाती हैं, मुझे भी बहुत पसंद है आज़ादी, बिना रोक-टोक और बिना भय वाली आज़ादी . गाहे-बगाहे मिल भी जाये ऐसी आज़ादी तो आसपास का माहौल जरुर इसमें खलल डाल ही देता हैं . और फिर ऐसी आज़ादी को पूरी तरह जी भी नहीं पाते कि आज़ादी का पर्याप्त समय समाप्त हो जाता हैं.