Friday, January 12, 2018

मुक्त

मुक्त

मैं क्यों बंधू उस रिश्ते में
जिसे रुपयों से टटोला जाता हैं
क्यों बंधू मैं उस रिश्ते में
जिसे सोने से तौला जाता हैं

कहने को हिस्सा हूँ मैं आधी आबादी का
फिर
क्यों हर बार मेरी बोली लगती हैं
रिश्ता ताउम्र का बनाना हैं
अफ़सोस
हर बार मंडी क्यों सजती हैं

मैं क्यों बंधू उस रिश्ते में
जिसे रुपयों से टटोला जाता हैं

वो कहते है ... रोते हैं .... चिल्लाते है ...
कभी – कभी डराते हैंधमकाते हैं

मैं कहती हूँ
नही बंधना मुझे उन रिश्तों  में
जहाँ जेब होतो ... जन्नत हो ...
नही बंधना मुझे उस रिश्ते में
बिना जेब जहाँ जहन्नुम हो ...

क्यों बंधू मैं उस रिश्ते में
जिसे सोने से तौला जाता हैं



क्यों झुकू किसी के जिद के आगे
मैं तो मुक्त रहना चाहती हूँ
क्यों रुकूं किसी के जिद के आगे
मैं उन्मुक्त उड़ना चाहती हूँ   


मैं क्यों बंधू उस रिश्ते में
जिसे रुपयों से टटोला जाता हैं
मैं क्यों बंधू उस रिश्ते में
जिसे सोने से तौला जाता हैं

प्यारी सी जिंदगी

 प्यारी सी जिंदगी 

बहुत प्यारी सी जिंदगी लगी कल रात मुझे
सुनहरी सी रात की शुरुआत में मैं
साथ तुम्हारे खुले सड़कों की आवोहवा को महसूस रही थी
खुद मदहोशी थी
लेकिन तुम्हारी मदहोशी को संभाल रही थी
तुम्हारी शरारती नज़रों को
खुद की लडखडाती हुई कदमों से रोक रही थी
तुम्हारे प्यार भरे अल्फ़ाज़ों को
खुद की मदहोशी में धीरे-धीरे घोल रही थी
कुछ देर एक दूसरे को थामे हम चलते रहे
दुनिया की फ़िक्र छोड़
एक दूजे में खोते रहे
मदहोशी के भरपूर आगोश में भी
तुम्हारा मेरे लिए हर ख़ुशी बटोर लेना
मन के सागर से पलकों को भीगोता रहा
मेरी बिंदास खोयाइशों में से एक खोयाईश पूरी हो रही थी
मन और दिल दोनों को राहत मिल रही थी
सब कुछ हौले हौले से फिसल रहा था
पर
मन इन सब कुछ को वक़्त के घेरे में कैद कर लेना चाहता था

Tuesday, January 2, 2018

मैं क्यों लिखती हूँ

मैं क्यों लिखती हूँ

मैं जो भी लिखती हूँनही जानती कि क्यों लिखती हूँ
यह खाली पन्ने
मुझसे देखे नहीं जाते
मैं इन पन्नों को भरने के लिए लिखती हूँ

मन के अंदर खाने में मची है हलचल मेरे
मैं इस हलचल को शांत करने के लिए लिखती हूँ

अपने आप से जंग ठाने बैठी हूँ मैं
मैं अपनी जीत टी करने के लिए लिखती हूँ

उड़ना चाहती हूँ मैं भी दूर गगन में
मैं पंखों की चाहत में लिखती हूँ

हैं रास्तों पर लाख कांटे बिछे हुए
मैं मंजिल पाने के लिए लिखती हूँ

कोरे कागज के सामान जिन्दगी है मेरी
मैं जिन्दगी को रंगीन बन्ने के लिए लिखती हूँ

है लाख शिकायत मुझे उस खुदा से
मैं उस खुदा को पाने के लिए लिखती हूँ

मैं लिखती हूँनहीं जानती की मैं क्यों लिखती हूँ .