Friday, December 22, 2017

इक्कसवीं सदी

 इक्कसवीं सदी 

रहने को तो रह रहे है हम आज इक्कसवीं सदी में
लेकिन सोच अभी भी है जमीदारी प्रथा वाली
आज समाज का हर वर्ग लिख पढ़ रहा है
अपनी सोच को स्वंय विकसित भी कर रहा है
फिर भी ना जाने क्यों जात-पात, धर्म-भेद, ऊंच-नीच, अमीर-गरीब के जाल में फंसा ही जा रहा है
जात-पात के नाम पर छुआछूत, धर्म भेद के  नाम पर दंगे,
ऊंच- नीच के नाम पर पिसना
और
अमीर गरीब के नाम पर भूनना
यह सब वो मुद्दे है जिन्हें धन सम्पन्न और कुर्सी परस्त लोग
बनाये रखना चाहते है
परत दर परत इन्हीं मुद्दों पर वो
गन्दी राजनीती कर अपनी रोटी सकते है
यह शिकारी अब अपनी जड़ युवाओं में बना रहा
वही पुराने मुद्दों को नयी परिभाषा में पिरो
अपनों में ही फुट डलवा रहा
सभी अगल-अलग विचारधाराओं में सिमट रहे है
सभी अपना एक गुट बनाने में विश्वास कर रहे है
भारत एकता देश कहा जाता है
लेकिन
आज इसे अपने ही अपनों में फूट डाल रहे है
यहां एकता समानता की सिर्फ दोगली बात को ही तवज्जो दी जाती है
असल में तो एकता समानता अब जुमला बन बस आँखों के सामने नाचता है

जिन्दगी की किताब

जिन्दगी की किताब 

कोरे पन्नों के साथ मिलती है जिंदगी की किताब 
जिसमें रंगीन रंग भरते है वक़्त के साथ

मेरी जिंदगी की किताब का खूबसूरत पन्ना हो
जिसे जितनी बार खोलूं
उतनी बार जी लेती हूं
और 
जितनी बार बंद करूं
उतनी ही बार खुद को खो देती हूं

पूरी किताब ना तुम्हारी खूबसूरत हुई , ना मेरी
फिर भी
हम बीत रहे पलों को खूबसूरत बनाने की कोशिश करते रहें

किताब का हर पन्ना नया फलसफ़ा लिखता है
हर पन्ने की शुरुआत नया सबब सिखाता है 

जाने-अनजाने इस सबब में कई चोटें लगती है
इस किताब को पूरा खूबसूरत बनाने में एक जिंदगी भी कम पड़ती है

मिश्रण

मिश्रण  
अक्सर दूध और पानी के मिश्रण की प्रकिया 
मुझे बेहद सुकून देती है 
जैसे ही दूध में पानी या पानी में दूध मिलता है
दोनों ही अपनी-अपनी छवि को कहीं दूर छोड़ एक-दूजे में मिल जाते है

Thursday, December 21, 2017

खुद के पंख

 खुद के पंख   

जब से होश संभाला तो हर पल यही सोच के खुश हुई कि 
मुझे स्त्री जन्म मिला
ये जन्म मैं भरपूर अपनी मर्जी से जिऊंगी
हर वो काम करूँगी जिसे करके मेरा आत्मविश्वास बढ़ेगा
खुद को किसी से कम नहीं आकूँगी
खुद के लिए अपनों से भी लड़ूंगी
खुद की सीमाएं, खुद की मर्यादा भी मैं ही मापूंगी
खुद के फैसले,खुद की इच्छाएं भी मैं ही तय करूँगी

लेकिन अब जब इन सभी फ़लसफों को जीने लगी हूँ 
तो हर बार मुझे हालात हराने पर आतुर रहती
मैं भी कुछ पल हालात की बातों में आ कर 
दो आंसू बहा लेती हूँ
फिर 
अगली सुबह खुद से खुद को पाने की जद्दोजहद में लग जाती हूँ 
खुद को हारते हुए नहीं, जीतते हुए स्वीकार करना चाहती हूँ 


अपनी अस्मिता को खुद के मापदंडों पर ही खरा उतारना है   
अपनी उड़ने की उडान में खुद के पंख को ही सबल बनाना है 

Monday, December 18, 2017

रिजेक्शन

  रिजेक्शन

 रिजेक्शन सिर्फ लड़कियां ही क्यों झेले
'ना' सिर्फ लड़कियां ही क्यों स्वीकारे
लड़के क्या सर्व गुण सम्पन्न ही पैदा होते है?
कोई खोट कोई नुक्स से क्या वो अछूते ही रहते है?
लड़कों में भी काले,नाटे,सूखे,फुले प्रजाति मिलती है
आँखों की कम रोशनी के साथ नैन नक्श भी टेढ़े-मेढ़े सामने आते है
फिर भी इतनी कमियों के साथ भी
जनाब हर लड़की को ऐश्वर्या से लेकर दीपिका पादुकोण तक आंकते -तौलते है
आंकने तौलते का दौर तीन-चार चरण में पूरा होता है
और
उसके बाद
लड़की की तरफ 'ना' बाज़ारी लागलपेटों के साथ भेज दिया जाता है
खुद की जीत और लड़की की हार में खुश हो
फिर वो आंकने के दौर में आगे बढ़ता है
जैसे
आंकने का ठेका सिर्फ उसकी जाती ने ही ले रखा है
रिजेक्शन की पीड़ा से मुक्त होना है
तो लड़कियों
आंकने और तौलने के बाजार में तुम भी बेधड़क उतरों
और इनके ठेकेदारों को उनके ही रंग में रंग रिजेक्शन का जबाब दो
तुम भी हर लड़के को आंको-तौलो शाहरुख़...सलमान से
'ना' भेजो बड़े ही साज-सज्जा से
तुम्हारी ये पहेल तुम्हे नेगेटिव से पॉजिटिव बनायेगी
तुम्हें इस दुनिया में खास बने रहने का अहसास कराएगी
तुम आसुंओं को नहीं खिलखिलाती हँसी को अपनाओगी
फिर तुम
अपने द्वारा किये गए हर रिजेक्शन का जश्न मनाओ
अपनी बेशकीमती दुनिया को रिजेक्शन मुक्त बनाओ

Wednesday, December 13, 2017

आज भी एक पिता

 आज भी एक पिता 
आज भी एक पिता के लिए उसकी बेटी
मजबूर होने का सबब बन रही है
सब कुछ में मीडियम होते हुए भी
समाज से नकारे जाने के सोच से सफर कर रही है
यह वही पिता है
जिसने बेटी पर ना कभी कोई पाबन्दी लगाई
ना ही बेटी की किसी इच्छा पर मनाही की मुहर लगाई
लेकिन आज जब बेटी बड़ी हो गई
उसके लिए वर की तलाश भी जारी हो गई तो
अब
पिता को रह रह कर यह अहसास सा हो रहा है कि
क्यों बेटी को शहरनुमा माहौल में उसने ढलने दिया
क्यों बेटी को समय के साथ चलने दिया
शायद
अगर बेटी समय से पीछे रहती
शहर को ना अपनाये होती
तो
समाज शायद उसे ना नकारता
शायद ही?
पिता इस सोच में खुद को घुलाये ही जा रहा है
पर एक पिता अपनी उम्मीद को कहां छोड़ता है?
बेटी का ब्याह ही उसकी संस्कृति में
उसे गंगा नहाने का पुण्य दिलाता है

अक्स

अक्स 

ढलती शाम का अक्स मुझे खूब भाता है
ना 
अंधेरी रात का पहरा होता है 
ना 
सुबह का उजाला गहराता है 
बस सब कुछ धुंधला धुंधला में छिपा रहता है
ये छिपना ही मुझे अपनी ओर खींचता है
इस छिपने में कोई भी अक्स साफ नहीं होता है
चाहे वो अक्स इंसान का हो या भविष्य का