इक्कसवीं सदी
इक्कसवीं सदी
रहने को तो रह रहे है हम आज इक्कसवीं सदी में
लेकिन सोच अभी भी है जमीदारी प्रथा वाली
आज समाज का हर वर्ग लिख पढ़ रहा है
अपनी सोच को स्वंय विकसित भी कर रहा है
फिर भी ना जाने क्यों जात-पात, धर्म-भेद, ऊंच-नीच, अमीर-गरीब के जाल में फंसा ही जा रहा है
जात-पात के नाम पर छुआछूत, धर्म भेद के नाम पर दंगे,
ऊंच- नीच के नाम पर पिसना
और
अमीर गरीब के नाम पर भूनना
लेकिन सोच अभी भी है जमीदारी प्रथा वाली
आज समाज का हर वर्ग लिख पढ़ रहा है
अपनी सोच को स्वंय विकसित भी कर रहा है
फिर भी ना जाने क्यों जात-पात, धर्म-भेद, ऊंच-नीच, अमीर-गरीब के जाल में फंसा ही जा रहा है
जात-पात के नाम पर छुआछूत, धर्म भेद के नाम पर दंगे,
ऊंच- नीच के नाम पर पिसना
और
अमीर गरीब के नाम पर भूनना
यह सब वो मुद्दे है जिन्हें धन सम्पन्न और कुर्सी परस्त लोग
बनाये रखना चाहते है
परत दर परत इन्हीं मुद्दों पर वो
गन्दी राजनीती कर अपनी रोटी सकते है
बनाये रखना चाहते है
परत दर परत इन्हीं मुद्दों पर वो
गन्दी राजनीती कर अपनी रोटी सकते है
यह शिकारी अब अपनी जड़ युवाओं में बना रहा
वही पुराने मुद्दों को नयी परिभाषा में पिरो
अपनों में ही फुट डलवा रहा
वही पुराने मुद्दों को नयी परिभाषा में पिरो
अपनों में ही फुट डलवा रहा
सभी अगल-अलग विचारधाराओं में सिमट रहे है
सभी अपना एक गुट बनाने में विश्वास कर रहे है
भारत एकता देश कहा जाता है
लेकिन
आज इसे अपने ही अपनों में फूट डाल रहे है
सभी अपना एक गुट बनाने में विश्वास कर रहे है
भारत एकता देश कहा जाता है
लेकिन
आज इसे अपने ही अपनों में फूट डाल रहे है
यहां एकता समानता की सिर्फ दोगली बात को ही तवज्जो दी जाती है
असल में तो एकता समानता अब जुमला बन बस आँखों के सामने नाचता है
असल में तो एकता समानता अब जुमला बन बस आँखों के सामने नाचता है
