Saturday, May 30, 2015

अनचाहा

अनचाहा 


वक़्त बदल जाता है 
साथ कम  हो जाता है 
अल्फाज़ खामोस हो जाते है 
जब 
वक़्त बेबस हो जाता है 

Sunday, May 24, 2015

एहसास

एहसास 


तू दूर हैं  मुझसे
पर……. 
तेरा एहसास मुझमे समाये हुए हैं 
तेरी अनुपस्तिथि में भी 
तेरे स्पर्श की सिहरन समाये हुए हैं 

Friday, May 22, 2015

कहने भर के है

कहने भर के है 


सिर्फ कहने भर के है आज सभी 
गोरे धंधे की आड़ में काले धंधे हैं । 
फिर भी 
चौड़े सीने  के साथ अपने आप को 
झुठलाते है। 
सभी  भोग-विलास भोगने को ललायित है ।  
इसलिए 
अच्छे बुरे का आकलन बेमानी है । 
कानून का भी डर कहाँ रहा ? 
जमानत मिलती है । 
जेल में हर सहुलियत पैसे के दम पर मिलती है । 
सिर्फ कहने भर के है आज सभी 
जिसमे 
राजनैतिक दल पहले नंबर पर आते है।  
बाकी 
सभी उनके पीछे-पीछे राग अलापते है  । 

 

Friday, May 15, 2015

बदनाम होने का डर

बदनाम होने का डर 


मन चाहता हैं बहुत कुछ 
पर डरता क्यों हैं ?
बदनाम तो हर वो आदमी हैं 
जो 
आज उचाईयों पर हैं 
फिर 
घबराता क्यों हैं ?
समाज एक से नहीं 
कई व्यक्ति व समूह  से बना हैं । 
सबका अपना - अपना नजरिया हैं । 
सबकी अपनी -अपनी सोच हैं । 
फिर क्या हैं बदनाम 
और 
क्यों हैं बदनाम, यह कौन तय करेगा ?
इसकी परिभाषा ही अपरिभाषित हैं ।