Thursday, August 17, 2017

धुआं उड़ाने की चाहत

धुआं उड़ाने की चाहत

धुआं उड़ाने की चाहत ने मुझसे
सिगरेट की चोरी कराई
इस चोरी में डर नही था,
थी तो बस धुआं उड़ाने की उत्सुकता

अक्सर मुझे धुआं उड़ाने वाले बिंदास और बेफिक्री नज़र आते
ये अदा ही मुझे धुआं उड़ाने की चाहत को बेक़रार करती

सिगरेट चोरी की थी
तो जल्दी जलाकर छुपाना था
माचिस की तीली से हडबडाहट में जलाया सिगरेट
और पहले ही कश में धुआं खीच लिया अन्दर तक

और महसूस करना चाहा की
कैसे बेफिक्र हुआ जाता है ?

लेकिन
धुआं भीतर ही भीतर घूम रहा
और मेरी बेचैनी को बढाता जा रहा
इसके बाद कुछ समझ नही आया
आँखों में खूब सारा आंसू भी भर आया

फिर भी
दूसरा कश लिया और सिगरेट को
ऐस ट्रे में दबाकर बुझा दिया
मैंने दुसरे कश के धुंए को मुहँ से
बहार किया
और खुद को जलती हुई
बेचैनी से दूर किया   

बेफिक्री तो नहीजलती हुई बेचैनी को
नजदीकी से महसूस किया
खैर
फिर कभी कश को अंदाज़ में उड़ाया जायेगा
आज तो
कोशिश पहली थी
अभी धुआं उड़ाने की कला सीखनी बाकी है .

कविता लिखनी की भी एक शर्त होती है

 कविता लिखनी की भी एक शर्त होती है

कविता लिखनी की भी एक शर्त होती है
यह शर्त भी कई बार बेअसर होती है
हाथ कलम तो पकड़ना चाहती है
पर कलम शब्द फूटने से परहेज़ करती है
ढलती शाम का सूरज और उगती शहर की लालिमा
मन को शीतलता के काफी करीब तक ले जाती है
जहन में बुनते हुए उथल पुथल ठहराव को तलाशती है
तब मन कविता के भाव को उकेरती है और शब्दों में पिरोती है
कभी अपनी सी कभी पराई सी प्रतीत होती है
जब भी उमड़ती है तो बेपनाह उमड़ती है
जहां चाह वहां राह फिर तो चक्कर घिरनी सी घूमती है
रह रह कर हाल ए दिलदर्द ए जुबां बयान करती है
यह तो अठखेलियों सी अल्हड़पन करती है
यह तो तितली बन हर जुबां का हाल जान लेती है
लेकिन अक्षरों में सिर्फ सिमटने में वक़्त लगाती है