Wednesday, December 9, 2015

रिशवत

रिशवत 

नया युग 
हैं नया शब्द 
रिशवत 
आज के युग में परिचित हैं सभी 
इस नाम से 
सिर्फ 
इसके रूप हैं अलग - अलग 
कहीं उपहार के रूप में 
कहीं फिरौती के रूप में 
तो कहीं 
जागरण व चन्द के रूप में रिशवत 
दिए और लिए जाते हैं 
चारो ओर हैं इसकी मांग 
चाहे 
हो डाक्टर या नेता 
लेते सभी हैं रिशवत
जो 
दे रिशवत वह विदवान कहलाये 
और 
जो करे इसका विरोध वह मुर्ख कहलाये 
मेहनत,ईमानदारी का करते अपमान 
 रिशवत का करते सम्मान 
हैं यह नया युग 
जहाँ हैं बोलबाला रिशवत का 
हैं जमाना रिशवत देने व लेने का
करवा रिशवत के दवारा हर काम 
कहलाये अपने को  कामयाब इन्सान 
अगर 
ऐसा ही चलता रहे 
तो 
खत्म हो जाएगी ईमानदारी 
छोड़ देने मेहनत करना 
और 
हरपल गुणगान करेंगे रिशवत का 
जो सही न होगा 
भारतीय सभ्यता के लिए 
खोखला कर  देगी 
हमारे जमीर को 
बर्बाद कर देगी हमारे 
आधुनिक नवयुवक को

बातो का सिलसिला

बातो का सिलसिला 

बाते करना भी हैं एक कला 
जो न जाने वह हैं एक बला 

बाते करने का सिलसिला दो पहलु पर चलता 
एक श्रोता दूसरा वक्ता कहलाता 

बाते करे व्यक्तित्व की पहचान 
रहे न कोई इससे अनजान 

बातो में हो रोचकता तो सुनने को जी चाहे 
यदि 
बातो में हो नीरसता तो अनसुना किया जाये 

बाते यदि दिल से कहीं जाये 
तो फिर 
क्यूँ न सबके मन को भाये 

बातो में होती मन क सवाल जबाव 
फिर क्यूँ 
न करना चाहे सभी वाद विवाद 


बातो से होता मन का बोझ हल्का 
फिर क्यों 
रहा जाये घुटकर सभी का 

बातो से जिन्दगी का मिलता हैं रस 
बिन 
बातो के जिन्दगी हो जाती हैं नीरस 

आनंद और ख़ुशी हैं बातो का राज 
फिर क्यों 
न बन सभी एक दुसरे के हमराज 

बाते हैं मिश्री की गीली 
फिर क्यों 
न बोले सभी मीठी बोली 

मौत और जिन्दगी

मौत और जिन्दगी 
कौन कहता हैं 
मौत डरने की चीज़ हैं 
हम कहते हैं 
डरने  की चीज़ तो जिन्दगी हैं 
मौत तो 
पल में आती,चली जाती हैं 
मगर 
जिन्दगी आती तो हैं पल में 
जाती देर में हैं 
पूछो उन लोगो से तुम 
वह जिन्दगी भी क्या 
जिन्दगी हैं 
जिनके राह  में सदैव भरा हो कांटा
हर दिन हो गमो और दुखो का सामना 
जीते हो जो हर क्षण 
घुट-घुटकर घुट-घुटकर
आपने नसीब पर 
रो-रोकर रो-रोकर
जिसे हर लम्हा जिन्दगी से दूर करता 
वो दिल मौत की चाहत करता 
पूछो उन लोगो से तुम 
जो जिन्दगी भर करता संघर्ष 
लेकिन
उसे मिलता न एक पल का हर्ष 
पूरी न हो मन की न आशा 
लगे सारा जीवन निराश 
भाग्य को कोसता 
अपने पर रोता 
वो जिन्दगी 
मौत को अपना हमसफ़र एंता 
पूछो उन लोगो से तुम 
दिन भर में जिसे न मिलती एक रोटी 
घर का पता नहीं 
रहते फुटपाथ पर 
जिन्दगी का पता नहीं 
कब आ जाये मौत खता नहीं 
जिन्दगी से ज्यादा 
मौत से करता प्यार 
तो क्यों 
मौत से डरता संसार 
ना भागो मौत से तुम 
ना डरो यह तो हैं तुम्हारी ही परछाई 

Tuesday, December 8, 2015

उदास शामे

उदास शामे 

नज़रों से दूर है 
यादों से भरपूर है 
ये दुरी अहसासों को मचलती है 
मनभाव को उकेरती है 
हर छुअन के सुगबुहाट को 
यूं होले -होले  सहलाती है 
 






विरह


विरह 

ये कैसी जुदाई हैं 
जिसमे आँख भर आई हैं 
खामोशी हैं और तन्हाई हैं 
जिसमे 
शब्दों के गुंजन की सहनाई हैं 

Thursday, December 3, 2015

नयी उम्मीद

नयी उम्मीद 

रोज घर से निकल भीड़ 
में गुम हो जाती हूँ 
और 
इस भीड़ में न जाने 
कितने बेबस और लाचार 
चेहरों से सामना होता हैं 
वो चेहरे रोज नये तो होते हैं 
पर 
उन चेहरों की बेबसी एक सी होती हैं 
आश्चर्य 
तो तब होता हैं 
जब बेबसी और लाचारी भरी जिन्दगी से भी 
वो अपनी एक मुस्कराहट से 
दुसरो को  जिन्दगी जीने की 
नयी उम्मीद दे जाते हैं 

वज़ूद

वज़ूद 

इस माहौल  में घुटन हैं 
जिल्लत हैं 
फिर भी 
मैं न जाने क्यों रोज-रोज 
इस माहौल से खुद को 
मुखाबित करती हूँ । 
हर दिन इस माहौल
को बर्दाश करने को 
खुद को तैयार करती हूँ । 
ये माहौल हमसे हमारी पहचान छीनता 
खुद से खुद का वज़ूद दूर करता 
बस 
स्वार्थ,स्वार्थ, और स्वार्थ,
ये माहौल मुझे दिखता 
वज़ूद  हैं । 
इस माहौल में रहना मेरी मज़बूरी हैं । 
यहाँ हर ढलते सूरज की कहानी अधूरी हैं ।