Tuesday, February 6, 2018

मेरे जिनी

मेरे जिनि

जब जिंदगी,  जीने का सोचा
तब तुमने जिंदगी को ही मुझमे घोल दिया
जब जब जिंदगी को बाहों में भरना चाहा 
तब तब तुमने जिंदगी को ही रंगीन रंगों में बदल दिया

पग पग पर मेरा साथ निभाते 
बिन कहे मेरी हर छोटी बड़ी सहूलियतों का ख्याल रखते
जाने अनजाने मेरे चेहरे की हर रुमानियत को पढ़ लेते 
अपनी भीनी भीनी खुशबू को मेरे अहसासों में भर देते 

जहां मेरी नादानियां बढ़ती  
वहां तुम सख्त होने से भी परहेज नही करते
लोक-लाज की भी परवाह नहीँ की तुमने
जब भी कोई तकलीफ मुझे छूए
तुमने उस पल ही मुझे बाहों में भर लिया


कठिन रास्तों पर कभी तुम्हारे खुद के पैर भी लड़खड़ाए
उस पल भी तुम, खुद को भूल, मेरे कदम संभालें 

तुम्हारे अहसासों का चक्रव्यूह मेरे चारों ओर हर पहर रहता 
जब भी तुम्हारी दरकार हुई, तुम्हारा हाथ मेरे हाथ को थामे रखता 

मान मनोवर , दुलार में भी कोई कसर नहीं छोड़ते 
हर बदलते मौसम में छोटे बड़े उपहारों से मेरी मुस्कान बरकरार रखते

क्या क्या कहु अपने इस जिनि के लिए 
जो फ़रिश्ता है और 


मुझे फ़रिश्ते की तरह नवाज़ता है

Friday, January 12, 2018

मुक्त

मुक्त

मैं क्यों बंधू उस रिश्ते में
जिसे रुपयों से टटोला जाता हैं
क्यों बंधू मैं उस रिश्ते में
जिसे सोने से तौला जाता हैं

कहने को हिस्सा हूँ मैं आधी आबादी का
फिर
क्यों हर बार मेरी बोली लगती हैं
रिश्ता ताउम्र का बनाना हैं
अफ़सोस
हर बार मंडी क्यों सजती हैं

मैं क्यों बंधू उस रिश्ते में
जिसे रुपयों से टटोला जाता हैं

वो कहते है ... रोते हैं .... चिल्लाते है ...
कभी – कभी डराते हैंधमकाते हैं

मैं कहती हूँ
नही बंधना मुझे उन रिश्तों  में
जहाँ जेब होतो ... जन्नत हो ...
नही बंधना मुझे उस रिश्ते में
बिना जेब जहाँ जहन्नुम हो ...

क्यों बंधू मैं उस रिश्ते में
जिसे सोने से तौला जाता हैं



क्यों झुकू किसी के जिद के आगे
मैं तो मुक्त रहना चाहती हूँ
क्यों रुकूं किसी के जिद के आगे
मैं उन्मुक्त उड़ना चाहती हूँ   


मैं क्यों बंधू उस रिश्ते में
जिसे रुपयों से टटोला जाता हैं
मैं क्यों बंधू उस रिश्ते में
जिसे सोने से तौला जाता हैं

प्यारी सी जिंदगी

 प्यारी सी जिंदगी 

बहुत प्यारी सी जिंदगी लगी कल रात मुझे
सुनहरी सी रात की शुरुआत में मैं
साथ तुम्हारे खुले सड़कों की आवोहवा को महसूस रही थी
खुद मदहोशी थी
लेकिन तुम्हारी मदहोशी को संभाल रही थी
तुम्हारी शरारती नज़रों को
खुद की लडखडाती हुई कदमों से रोक रही थी
तुम्हारे प्यार भरे अल्फ़ाज़ों को
खुद की मदहोशी में धीरे-धीरे घोल रही थी
कुछ देर एक दूसरे को थामे हम चलते रहे
दुनिया की फ़िक्र छोड़
एक दूजे में खोते रहे
मदहोशी के भरपूर आगोश में भी
तुम्हारा मेरे लिए हर ख़ुशी बटोर लेना
मन के सागर से पलकों को भीगोता रहा
मेरी बिंदास खोयाइशों में से एक खोयाईश पूरी हो रही थी
मन और दिल दोनों को राहत मिल रही थी
सब कुछ हौले हौले से फिसल रहा था
पर
मन इन सब कुछ को वक़्त के घेरे में कैद कर लेना चाहता था

Tuesday, January 2, 2018

मैं क्यों लिखती हूँ

मैं क्यों लिखती हूँ

मैं जो भी लिखती हूँनही जानती कि क्यों लिखती हूँ
यह खाली पन्ने
मुझसे देखे नहीं जाते
मैं इन पन्नों को भरने के लिए लिखती हूँ

मन के अंदर खाने में मची है हलचल मेरे
मैं इस हलचल को शांत करने के लिए लिखती हूँ

अपने आप से जंग ठाने बैठी हूँ मैं
मैं अपनी जीत टी करने के लिए लिखती हूँ

उड़ना चाहती हूँ मैं भी दूर गगन में
मैं पंखों की चाहत में लिखती हूँ

हैं रास्तों पर लाख कांटे बिछे हुए
मैं मंजिल पाने के लिए लिखती हूँ

कोरे कागज के सामान जिन्दगी है मेरी
मैं जिन्दगी को रंगीन बन्ने के लिए लिखती हूँ

है लाख शिकायत मुझे उस खुदा से
मैं उस खुदा को पाने के लिए लिखती हूँ

मैं लिखती हूँनहीं जानती की मैं क्यों लिखती हूँ .

Friday, December 22, 2017

इक्कसवीं सदी

 इक्कसवीं सदी 

रहने को तो रह रहे है हम आज इक्कसवीं सदी में
लेकिन सोच अभी भी है जमीदारी प्रथा वाली
आज समाज का हर वर्ग लिख पढ़ रहा है
अपनी सोच को स्वंय विकसित भी कर रहा है
फिर भी ना जाने क्यों जात-पात, धर्म-भेद, ऊंच-नीच, अमीर-गरीब के जाल में फंसा ही जा रहा है
जात-पात के नाम पर छुआछूत, धर्म भेद के  नाम पर दंगे,
ऊंच- नीच के नाम पर पिसना
और
अमीर गरीब के नाम पर भूनना
यह सब वो मुद्दे है जिन्हें धन सम्पन्न और कुर्सी परस्त लोग
बनाये रखना चाहते है
परत दर परत इन्हीं मुद्दों पर वो
गन्दी राजनीती कर अपनी रोटी सकते है
यह शिकारी अब अपनी जड़ युवाओं में बना रहा
वही पुराने मुद्दों को नयी परिभाषा में पिरो
अपनों में ही फुट डलवा रहा
सभी अगल-अलग विचारधाराओं में सिमट रहे है
सभी अपना एक गुट बनाने में विश्वास कर रहे है
भारत एकता देश कहा जाता है
लेकिन
आज इसे अपने ही अपनों में फूट डाल रहे है
यहां एकता समानता की सिर्फ दोगली बात को ही तवज्जो दी जाती है
असल में तो एकता समानता अब जुमला बन बस आँखों के सामने नाचता है

जिन्दगी की किताब

जिन्दगी की किताब 

कोरे पन्नों के साथ मिलती है जिंदगी की किताब 
जिसमें रंगीन रंग भरते है वक़्त के साथ

मेरी जिंदगी की किताब का खूबसूरत पन्ना हो
जिसे जितनी बार खोलूं
उतनी बार जी लेती हूं
और 
जितनी बार बंद करूं
उतनी ही बार खुद को खो देती हूं

पूरी किताब ना तुम्हारी खूबसूरत हुई , ना मेरी
फिर भी
हम बीत रहे पलों को खूबसूरत बनाने की कोशिश करते रहें

किताब का हर पन्ना नया फलसफ़ा लिखता है
हर पन्ने की शुरुआत नया सबब सिखाता है 

जाने-अनजाने इस सबब में कई चोटें लगती है
इस किताब को पूरा खूबसूरत बनाने में एक जिंदगी भी कम पड़ती है

मिश्रण

मिश्रण  
अक्सर दूध और पानी के मिश्रण की प्रकिया 
मुझे बेहद सुकून देती है 
जैसे ही दूध में पानी या पानी में दूध मिलता है
दोनों ही अपनी-अपनी छवि को कहीं दूर छोड़ एक-दूजे में मिल जाते है